101+ Popular Kabir Ke Dohe In Hindi With Meaning

Kabir Ke Dohe In Hindi With Meaning

कबीरदास के जीवन। संक्षिप्त परिचय।

साहित्य जगत मे विशेष स्थान रखने वाले कबीर दास जी के जन्म और जन्मस्थान को लेकर विद्वानो मे मतभेद देखने को मिलता है । कुछ विद्वान इनका जन्म काशी में सन् 1398 तथा कुछ सन् 1440 मे हुआ मानते है।

Kabir Ke Dohe In Hindi With Meaning
Kabir Ke Dohe In Hindi With Meaning

saऐसा माना जाता है कि कबीर दास का जन्म एक ब्राह्मण परिवार मे हुआ। लेकिन विधवा होने के कारण लोक-लाज के डर से इनकी माँ ने इन्हे लहरतारा नामक तालाब के किनारे छोड़ दिया । वहा ये एक मुश्लिम जुलाहे दम्पति नीरू व नीमा को मिले ।

उन्होने कबीर को अपने पास रख लिया और उनका पालन -पोषण किया। बाद मे उन्होने पैतृक व्यवसाय को अपनाया और कपड़ो की बुनाई करने लगे माना जाता है कि कबीर पढ़े-लिखे नही थे। वो जो कहते थे उनके शिष्य उसे लिख दिया करते थे।

वे एक ही ईश्व को मानते थे । अवतार, मूर्तिपूजा आदि मे वे विश्वास नही करते थे। वे निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। कहा जाता है कि कबीर दास वाराणसी के पंचगंगा घाट की सीढ़ियो पर रामानंद जी की प्रतिक्षा मे लेट गये जब स्वामी रामानंद जी सीढ़ियो से उतरे

तो उनका पैर कबीर दास के शरीर पर पड़ा और उनके से राम-राम मुख शब्द निकला। उसी राम को दीक्षा मंत्र मानकर कबीर दास ने रामानंद जी को अपना गुरू स्वीकार कर लिया।

कबीर दास जी की पत्नी का नाम लोई था। उनके पुत्र का नाम कमाल व पुत्री का नाम कमाली था। कबी दास की भाषा पंचमेल खिचड़ी एवं सधुक्कड़ी है क्योंकि उनकी भाषा में हिन्दी भाषा की सभी बोलियों के शब्द सम्मिलित है ।

राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी, ब्रजभाषा के शब्द अधिकतर प्रयोग किये गए है। कबीर दास मानते थे कि गति कर्मों के अनुसार मिलती है ना कि किसी विशेष

स्थान पर मृत्यु के कारण। इसलिए वह अपने अंतिम समय मे काशी को छोड़ मगहर चले गये क्योंकि लोगो की ऐसी मान्यता थी कि काशी मे मरने पर स्वर्ग और मगहर पर मरने पर नरक मिलता है। मगहर मे सन् 1518 में ” विद्वानों के अनुसार “ उन्होंने अपनी अंतिम सास ली

कबीरदास के द्वारा रचित हुवा कृतियाँ।

धर्मदास ने कबीर की वाणियों का संग्रह ” बीजक “ जिसके तीन मुख्य भाग है नामक ग्रंथ में किया है।

साखी- अर्थात् साक्षी, कबीर की शिक्षाओं और सिद्धातों का निरूपण अधिकतर साखी मे हुआ है।

सबद- गेय पद है, जिसमे संगीत विद्यमान होता है । इसमे कबीर दास की प्रेम और अंतरंग साधना की अभिव्यक्ति हुई है। रमैनी- चौपाई छंद मे लिखी गयी है। इनमे कबीर दास जी के रहस्यवादी और दार्शनिक विचारों को प्रकट किया गया है।

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कबीर के 101+ दोहे हिंदी अर्थ के साथ

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 1

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ |
पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ||

अर्थ – बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुंच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 2

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ – इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 3

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ – कोई व्यक्ति लंबे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर के ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरों।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 4

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ – सज्जन की जाती ना पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है ना कि उसकी म्यान का – उसे ढकने वाले खोल का।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 5

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आंख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 6

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।

अर्थ – मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ धड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा !

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 7

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ – जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा ना मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 8

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवईं, जिनका आदि ना अंत।

अर्थ – यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 9

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ – जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ ना कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ लेकर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 10

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

अर्थ – यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रतन है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 11

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ – ना तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 12

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

अर्थ – जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ करता है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 13

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ – इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है। यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 14

कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।

अर्थ – इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी ना हो !

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 15

हिंदू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमान,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि हिंदू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है। इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 16

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।
कहीं कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो फहला दिन।

अर्थ – कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर ना सुलझ पाया। कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता। आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 17

कलरि लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए। बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 18

जब गुन को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई।
जब गुन को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है। पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 19

कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस।
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि हे मानव! तू क्या गर्व करता है? कॉल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है। मालूम नहीं, वह घर या परदेस में, कहां पर तुझे मार डाले।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 20

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।

अर्थ – सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिले फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 21

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उड़ी जाइ।
जो जैसी संगति कर, सो तैसा ही फल पाइ।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 22

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।

अर्थ – शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 23

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 24

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर।
आसा त्रिसना न मुई, यों कहीं गए कबीर।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 25

मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।

अर्थ – मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो, उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रुखी रोटी कोई न खाएगा।

कबीर दास
कबीर दास

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 26

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही।।

अर्थ – जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 27

कबीर सुता क्या करें, जागी न जपे मुरारी।
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी।।

अर्थ – कबीर कहते हैं – अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो। सजग होकर प्रभु का ध्यान करो। वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निंद्रा में सो ही जाना है – जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते?

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 28

आछे/ पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत।
अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गई खेत।।

अर्थ – देखते ही देखते सब भले दिन – अच्छा समय बीतता चला गया – तुमने प्रभु से लौ नहीं लगाई – प्यार नहीं किया समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा? पहले जागरूक न थे – ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही न करें और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 29

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय।।

अर्थ – रात नींद में नष्ट कर दी – सोते रहे – दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली या मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया – कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा?

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 30

खड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।

अर्थ – खजूर के पेड़ के समान बड़ा होने का क्या लाभ, जो ना ठीक से किसी को छाँव दे पाता है और न ही उसके फल सुलभ होते हैं।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 31

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात।
एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात।

अर्थ – कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है। जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते है, वैसे ही यह देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 32

हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं धास।
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास।

अर्थ – यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं। संपूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 33

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

अर्थ – इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 34

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि अरे जीव! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 35.

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस।
भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस।

अर्थ – कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 36

दोहा 36. हरिया जांणे रुखड़ा, उस पाणी का नेह।
सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह।।

अर्थ – पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है. सूखा काठ – लकड़ी क्या जाने कि कब पानी बरसा? अर्थात सहृदय ही प्रेम भाव को समझता है. निर्मम मन इस भावना को क्या जाने?

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 37

झिरमिर – झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह।
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह।।

अर्थ – बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 38.

कहत सुनत सब दिन गए, उरझी न सुरझ्या मन।
कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।।

अर्थ – कहते सुनते सब दिन बीत गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया ! कबीर कहते हैं कि यह मन अभी भी होश में नहीं आता. आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के ही समान है.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 39.

कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण।
कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण।।

अर्थ – थोड़ा सा जीवन है, उसके लिए मनुष्य अनेक प्रकार के प्रबंध कहता है. चाहे राजा हो या निर्धन चाहे बादशाह – सब खड़े खड़े ही नष्ट हो गए.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 40.

झिरमिर-झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह।
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह।।

अर्थ – बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 41.

इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह।
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय।।

अर्थ – एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब सबसे बिछुड़ना पड़ेगा. हे राजाओं ! हे छत्रपतियों ! तुम अभी से सावधान क्यों नहीं हो जाते !

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 42.

कबीर प्रेम न चक्खिया, चक्खि न लिया साव।
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने प्रेम को चखा नहीं, और चख कर स्वाद नहीं लिया, वह उस अतिथि के समान है जो सूने, निर्जन घर में जैसा आता है, वैसा ही चला भी जाता है, कुछ प्राप्त नहीं कर पाता.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 43.

मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह।
ए सबही अहला गया, जबही कह्मा कुछ देह।

अर्थ – मान, महत्त्व, प्रेम रस गौरव गुण तथा स्नेह – सब बाढ़ में बह जाते हैं जब किसी मनुष्य से कुछ देने के लिए कहा जाता है।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 44.

मन मरया ममता मुई, जहं गई सब छूटी।
जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति।।

अर्थ – मन को मार डाला ममता भी समाप्त हो गई अहंकार सब नष्ट हो गया जो योगी था वह तो यहाँ से चला गया अब आसन पर उसकी भस्म – विभूति पड़ी रह गई अर्थात संसार में केवल उसका यश रह गया

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 45

दोहा 45. तरवर तास बिलम्बिए, बारह मांस फलंत।
सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करंत।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि ऐसे वृक्ष के नीचे विश्राम करो जो बारहों महीने फल देता हो. जिसकी छाया शीतल हो, फल सघन हों और जहां पक्षी क्रीडा करते हों!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 46.

काची काया मन अथिर थिर थिर काम करंत।
ज्यूं ज्यूं नर निधड़क फिरै त्यूं त्यूं काल हसन्त।।

अर्थ – शरीर कच्चा अर्थात नश्वर है मन चंचल है परंतु तुम इन्हें स्थिर मानकर काम करते हो – इन्हें अनश्वर मानते हो मनुष्य जितना इस संसार में रमकर निडर घूमता है – मगन रहता है – उतना ही काल (अर्थात मृत्यु) उस पर हँसता है! मृत्यु पास है यह जानकर भी इंसान अनजान बना रहता है! कितनी दुखभरी बात है.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 47.

जल में कुम्भ कुम्भ में जल है बाहर भीतर पानी।
फूटा कुम्भ जल जलहि समाना यह तथ कह्मौ गयानी।।

अर्थ – जब पानी भरने जाएं तो घडा जल में रहता है और भरने पर जल घड़े के अंदर आ जाता है इस तरह देखें तो – बाहर और भीतर पानी ही रहता है – पानी की ही सत्ता है. जब घडा फूट जाए तो उसका जल जल में ही मिल जाता है – अलगाव नहीं रहता – ज्ञानी जन इस तथ्य को कह गए है! आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैं – आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान है. अंततः परमात्मा की ही सत्ता है – जब देह विलीन होती है – वह परमात्मा का ही अंश हो जाती है – उसी में समा जाती है. एकाकार हो जाती है.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 48.

तू कहता कागज की लेखी मैं कहता आँखिन की देखी।
मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उड़झाई रे।।

अर्थ – तुम कागज़ पर लिखी बात को सत्य कहते हो – तुम्हारे लिए वह सत्य है जो कागज़ पर लिखा है. किन्तु मैं आंखों देखा सच ही कहता और लिखता हूँ. कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे पर उनकी बातों में सच्चाई थी. मैं सरलता से हर बात को सुलझाना चाहता हूँ – तुम उसे उलझा कर क्यों रख देते हो? जितने सरल बनोगे – उलझन से उतने ही दूर हो पाओगे.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 49.

मन के हारे हार है मन के जीते जीत।
कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत।।

अर्थ – जीवन में जय पराजय केबल मन की भावनाएं हैं. यदि मनुष्य मन में हार गया – निराश हो गया तो पराजय है और यदि उसने मन को जीत लिया तो वह विजेता है. ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पा सकता है – यदि प्राप्ति का भरोसा ही नहीं तो कैसे पाएंगे?

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 50.

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहीं।।

अर्थ – जब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार न हुआ. जब अहम समाप्त हुआ तभी प्रभु मिले. जब ईश्वर का साक्षात्कार हुआ – तब अहम स्वतः नष्ट हो गया. ईश्वर की सत्ता का बोध तभी हुआ जब अहंकार गया. प्रेम में द्वैत भाव नहीं हो सकता – प्रेम की संकरी – पतली गली में एक ही समा सकता है – अहम् या परम – परम की प्राप्ति के लिए अहम का विसर्जन आवश्यक है.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 51.

जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ।
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ।।

अर्थ – जो जाता है उसे जाने दो. तुम अपनी स्थिति को, दशा को न जाने दो. यदि तुम अपने स्वरूप मे बने रहे तो केवट की नाव की तरह अनेक व्यक्ति आकर तुमसे मिलेंगे.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 52.

मानुष जन्म दुलभ है, देह न बारम्बार।
तरवर थे फल झड़ी पड्या, बहुरि न लागे डारि।।

अर्थ – मानव जन्म पाना कठिन है. यह शरीर बार-बार नहीं मिलता. जो फल वृक्ष से नीचे गिर पड़ता है वह पुनः उसकी डाल पर नहीं लगता.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 53.

यह तन काचा कुम्भ है, लिया फिरे था साथ।
ढबका लागा फूटिगा, कुछ न आया हाथ।।

अर्थ – यह शरीर कच्चा घड़ा है जिसे तू साथ लिए घूमता फिरता था. जरा सी चोट लगते ही यह फूट गया. कुछ भी हाथ नहीं आया.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 54.

मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसी भागि।
कब लग राखैं है सखी, रुई लपेटी आगि।।

अर्थ – अहंकार बहुत बुरी वस्तु है. हो सके तो इससे निकल कर भाग जाओ. रुई में लिपटी इस अग्नि – अहंकार – को मैं कब तक अपने पास रखूँ?

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 55.

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई।
अंतरि भीगी आत्मा, हीर भई बनराई।

अर्थ – कबीर कहते हैं – प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा – जिससे अंतरात्मा तक भीग गई, आस पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया – खुश हाल हो गया – यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है! हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 56.

जिहि घट प्रेम ना प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम।
ते नर या संसार में, उपजी भए बेकाम।।

अर्थ – जिनके हृदय में ना तो प्रीति है और न प्रेम का स्वाद, जिनकी जीह्वा पर राम का नाम नहीं रहता – वह मनुष्य इस संसार में उत्पन्न होकर भी व्यर्थ है. प्रेम जीवन की सार्थकता है. प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 57.

लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार।
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार।।

अर्थ – घर दूर है मार्ग लंबा है रास्ता भयंकर है और उसमें अनेक पातक चोर ठग है. हे सज्जनों! कहो, भगवान् का दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हो? संसार में जीवन कठिन है – अनेक बाधाएं हैं विपत्तियां है – उनमें पड़कर हम भरमाए रहते हैं – बहुत से आकर्षण हमें अपनी ओर खींचते रहते हैं – हम अपना लक्ष्य भूलते रहते हैं – अपनी पूंजी गंवाते रहते हैं

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 58.

इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव।
लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव।।

अर्थ – इस शरीर को दीपक बना लूं, उसमें प्राणों की बत्ती डालूँ और रक्त से तेल की तरह सींचूं – इस तरह दीपक जला कर मैं अपने प्रिया के मुख का दर्शन अब कर पाऊंगा? ईश्वर से लौ लगाना उसे पाने की चाह करना उसकी भक्ति में तन मन को लगाना एक साधना है तपस्या है – जिसे कोई कोई विरला ही कर पाता है!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 59.

नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नेन झंपेउ।
ना हौं देखूं और को न तुझ देखन देऊँ।।

अर्थ – हे प्रिय! (प्रभु) तुम इन दो नेत्रों की राह से मेरे भीतर आ जाओ और फिर मैं अपने इन नेत्रों को बंद कर लूं! फिर न तो मैं किसी दूसरे को देखूं और न किसी और को तुम्हें देखने ढूं!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 60.

कबीर रेख सिन्दूर की कागज दिया न जाई।
नैनूं रमैया रमि रहा दूजा कहाँ समाई।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा है – वहां कागज नहीं दिया जा सकता. जब नेत्रों मे राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है?

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 61.

कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास।
समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि समुद्र की सीपी प्यास प्यास रटती रहती है. स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा लिए हुए समुंद्र की अपार जलराशि को तिनके के बराबर समझती है. हमारे मन में जो पाने की ललक है जिसे पाने की लगन है, उसके बिना सब निस्सार हैं.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 62.

सातों सबद जू बाजते घरि घरि होते राग।
ते मंदिर खाली परे बेसन लागे काग।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि जिन घरों में शब्द स्वर गूंजते थे, पल-पल उत्सव मनाए जाते थे, वे घर भी अब खाली पड़े हैं – उन पर कौए बैठने लगे हैं. हमेशा एक सा समय तो नहीं रहता! जहां खुशियाँ थी वहां गम छा जाता है जहां हर्ष था वहां विषाद डेरा डाल सकता है – यह इस संसार में होता है!.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 63.

कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास।
काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि ऊंचे भवनों को देखकर क्याघमंड करते हो? कल या परसों ये ऊंचाइयां और (आप भी) धरती पर लेट जाएंगे ध्वस्त हो जाएंगे और ऊपर से घास उगने लगेगी! वीरान सुनसान हो जाएगा जो अभी हंसता खिलखिलाता घर आंगन है! इसलिए कभी गर्व न करना चाहिए।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 64.

जांमण मरण बिचारी करि कूड़े काम निबारि।
जिनि पंथूं तुझ चालणा सोई पंथ संवारि।।

अर्थ – जन्म और मरण का विचार करके, बुरे कर्मों को छोड़ दे. जिस मार्ग पर तुझे चलना है उसी मार्ग का स्मरण कर – उसे ही याद रख – उसे ही सवार सुन्दर बना-

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 65.

बिन रखवाले बाहिरा चिड़िये खाया खेत।
आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत।।

अर्थ – रखवाले के बिना बाहर से चिड़ियों ने खेत खा लिया. कुछ खेत अब भी बचा है – यदि सावधान हो सकते हो तो हो जाओ – उसे बचा लो! जीवन में असावधानी के कारण इंसान बहुत कुछ गँवा देता है – उसे खबर भी नहीं लगती – नुकसान हो चुका होता है – यदि हम सावधानी बरतें तो कितने नुकसान से बच सकते हैं! इसलिए जागरूक होना है हर इंसान को – ( जैसे पराली जलाने की सावधानी बरतते तो दिल्ली में भयंकर वायु प्रदूषण से बचते पर – अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 66.

कबीर देवल ढहि पड्या ईंट भई सेंवार।
करी चिजारा सौं प्रीतड़ी ज्यूं ढहे न दूजी बार।।

अर्थ – कबीर कहते हैं शरीर रूपी देवालय नष्ट हो गया – उसकी ईंट ईंट – ( अर्थात शरीर का अंग अंग ) – शैवाल अर्थात खाई में बदल गई. इस देवालय को बनाने वाले प्रभु से प्रेम कर जिससे यह देवालय दूसरी बार नष्ट न हो।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 67.

कबीर मंदिर लाख का, जडियां हीरे लालि।
दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि।

अर्थ – यह शरीर लाख का बना मंदिर है जिसमें हीरे और लाल जड़े हुए हैं. यह चार दिन का खिलौना है कल ही नष्ट हो जाएगा. शरीर नश्वर है – जतन करके मेहनत करके उसे सजाते हैं तब उसकी क्षण भंगुरता को भूल जाते हैं किन्तु सत्य तो इतना ही है कि देह किसी कच्चे खिलौने की तरह टूट फूट जाती है – अचानक ऐसे कि हम जान भी नहीं पाते!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 68.

कबीर यह तनु जात है सकै तो लेहू बहोरि।
नंगे हाथूं ते गए जिनके लाख करोडि।।

अर्थ – यह शरीर नष्ट होने वाला है हो सके तो अब भी संभल जाओ – इसे संभाल लो! जिनके पास लाखों करोड़ों की संपत्ति थी वे भी यहाँ से खाली हाथ ही गए हैं – इसलिए जीते जी धन संपत्ति जोड़ने में ही ना लगे रहो – कुछ सार्थक भी कर लो! जीवन को कोई दिशा दे लो – कुछ भले काम कर लो!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 69.

हू तन तो सब बन भया करम भए कुहांडि।
आप आप कूँ काटि है, कहै कबीर बिचारी।।

अर्थ – यह शरीर तो सब जंगल के समान है – हमारे कर्म ही कुल्हाड़ी के समान है. इस प्रकार हम खुद अपने आप को काट रहे हैं – यह बात कबीर सोच विचार कर कहते हैं.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 70.

तेरा संगी कोई नहीं सब स्वार्रथ बंधी लोइ।
मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ।।

अर्थ – तेरा साथी कोई भी नहीं है. सब मनुष्य स्वार्थ में बंधे हुए हैं, जब तक इस बात की प्रतीति – भरोसा – मन में उत्पन्न नहीं होता तब तक आत्मा के प्रति विश्वास जाग्रत नहीं होता. अर्थात वास्तविकता का ज्ञान न होने से मनुष्य संसार में रमा रहता है जब संसार के सच को जान लेता है – इस स्वार्थमय सृष्टि को समझ लेता है – तब ही अंतरात्मा की ओर उन्मुख होता है – भीतर झांकता है!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 71.

मैं मैं मेरी जिनी करै, मेरी सूल बिनास।
मेरी पग का पैषणा मेरी गल की पास।।

अर्थ – ममता और अहंकार में मत फंसो और बंधो – यह मेरा है कि रट मत लगाओ – यह विनाश के मूल है – जड़ है – कारण है – ममता पैरों की बेडी है और गले की फांसी है

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 72.

कबीर नाव जर्जरी कूड़े खेवनहार।
हलके हलके तिरि गए बुड़े तिनि सर भार!।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि जीवन की नौका टूटी फूटी है जर्जर है उसे खेने वाले मूर्ख हैं जिनके सर पर (विषय वासनाओं) का बोझ है वे तो संसार सागर में डूब जाते हैं – संसारी होकर रह जाते हैं दुनिया के धंधों से उबर नहीं पाते – उसी में उलझ कर रह जाते हैं पर जो इन से मुक्त है – हलके हैं वे तर जाते हैं पाठ लग जाते हैं भव सागर में डूबने से बच जाते हैं

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 73.

मन जाणे सब बात जांणत ही औगुन करै।
काहे की कुसलात कर दीपक कूंवै पड़े।।

अर्थ – मन सब बातों को जानता है जानता हुआ भी अवगुणों में फंस जाता है जो दीपक हाथ में पकडे हुए भी कुएं में गिर पड़े उसकी कुशल कैसी?

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 74.

हिरदा भीतर आरसी मुख देखा नहीं जाई।
मुख तो तौ परी देखिए जे मन की दुविधा जाई।।

अर्थ – ह्रदय के अंदर ही दर्पण है परन्तु – वासनाओं की मलिनता के कारण – मुख का स्वरूप दिखाई ही नहीं देता मुख या अपना चेहरा या वास्तविक स्वरूप तो तभी दिखाई पड सकता जब मन का संशय मिट जाए!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 75.

करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय।
बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय।।

अर्थ – यदि तू अपने को कर्ता समझता था तो चुप क्यों बैठा रहा? और अब कर्म करके पश्चाताप क्यों करता है? पेड़ तो बबूल का लगाया है – फिर आम खाने को कहाँ से मिलें?

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 76.

मनहिं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न हुइ।
पाणी मैं घीव नीकसै, तो रुखा खाई न कोइ।।

अर्थ – मन की इच्छा छोड़ दो. उन्हें तुम अपने बल पर पूरा नहीं कर सकते. यदि जल से घी निकल आवे, तो रोटी रोटी कोई भी न खाएगा!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 77.

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर।
आसा त्रिसना न मुई, यों कहीं गए कबीर।।

अर्थ – न माया मरती है न मन शरीर न जाने कितनी बार मर चुका. आशा, तृष्णा कभी नहीं मरती – ऐसा कबीर कई बार कह चुके हैं.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 78.

कबीर सो धन संचिए जो आगे कूं होइ।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्या कोइ।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम दे. सर पर धन की गठरी बांध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 79.

झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह।
झूठे को साँचा मिले तब ही टूटे नेह।।

अर्थ – जब झूठे आदमी को दूसरा झूठा आदमी मिलता है तो दो ना प्रेम बढ़ता है. पर जब झूठे को एक सच्चा आदमी मिलता है तभी प्रेम टूट जाता है.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 80.

करता केरे गुन बहुत औगुन कोई नाहिं।
जे दिल खोजों आपना, सब औगुन मुझ माहिं।।

अर्थ – प्रभु में गुण बहुत है – अवगुण कोई नहीं है. जब हम अपने हृदय की खोज करते हैं तब समस्त अवगुण अपने ही भीतर पाते हैं.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 81.

हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार।
कौतिकहारा भी जले कासों करूं पुकार।।

अर्थ – दाह क्रिया में हड्डियां जलती हैं उन्हें जलाने वाली लकड़ी जलती है उनमें आग लगाने वाला भी एक दिन जल जाता है. समय आने पर उस हश्य को देखने वाला दर्शक भी जल जाता है. जब सब का अंत यही हो तो पनी पुकार किसको दूं? किससे गुहार करूं – विनती या कोई आग्रह करूं? सभी तो एक नियति से बंधे हैं! सभी का अंत एक है!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 82.

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय।।

अर्थ – रात सो कर बिता दी, दिन खा कर बिता दिया हीरे के समान कीमती जीवन को संसार के निर्मूल्य विषयों की – कामनाओं और वासनाओं की भेंट चढ़ा दिया – इससे दुखद क्या हो सकता है?

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 83.

मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग।
तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग।।

अर्थ – बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला – कपट से भरा है – उसे तो कौआ भला है जिसका तन मन एक जैसा है और वह किसी को छलता भी नहीं है.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 84.

कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं।
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं।।

अर्थ – इस जगत में न कोई हमारा अपना है और न ही हम किसी के! जैसे नांव के नदी पार पहुँचने पर उसमें मिलकर बैठे हुए सभी यात्री बिछड़ जाते हैं वैसे ही हम सब मिल कर बिछड़ने वाले हैं. सब सांसारिक संबंध यहीं छूट जाने वाले हैं.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 85.

देह धरे का दंड है सब काहू को होय।
ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोए।।

अर्थ – देह धारण करने का दंड – भोग या प्रारब्ध है जो सबको भुगतना होता है. अंतर इतना ही है कि ज्ञानी या समझदार व्यक्ति इस भोग या दुख को समझदारी से भोगता है निभाता है संतुष्ट रहता है जबकि अज्ञानी रोते हुए – दुखी मन से सब कुछ झेलता है!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 86.

हीरा परखै जौहरी शब्दहि परखै साध।
कबीर परखै साध को ताका मता अगाध।।

अर्थ – हीरे की परख जोहरी जानता है – शब्द के सार – असार को परखने वाला विवेकी साधु – सज्जन होता है. कबीर कहते हैं कि जो साधु – असाधु को परख लेता है उसका मत – अधिक गहन गंभीर है!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 87.

एकही बार परखिये ना वा बारम्बार।
बालू तो हू किरकिरी जो छानै सौ बार।।

अर्थ – किसी व्यक्ति को बस ठीक ठीक एक बार ही परख लो तो उसे बार-बार परखने की आवश्यकता न होती. रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो भी उसकी किरकिराहट दूर न होगी – इसी प्रकार मूढ़ दुर्जन को बार-बार भी परखो तब भी वह अपनी मूढ़ता दुष्टता से भरा वैसा ही मिलेगा. किंतु सही व्यक्ति की परख एक बार में ही हो जाती है!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 88.

पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत।
सब सखियाँ में यों दिपै ज्यों सूरज की जोत।।

अर्थ – पतिव्रता स्त्री यदि तन से मैली भी हो भी अच्छा है. चाहे उसके गले में केवल कांच के मोती की माला ही क्यों न हो. फिर भी वह अपनी सब सखियों के बीच सूर्य के तेज के समान चमकती है!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 89.

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ – मैं इस संसार में बुरे व्यक्ति की खोज करने चला था लेकिन जब अपने घर – अपने मन में झाँक कर देखा तो खुद से बुरा कोई न पाया अर्थात हम दूसरे की बुराई पर नजर रखते हैं पर अपने आप को नहीं निहारते!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 90.

कबीर चन्दन के निडै नींव भी चन्दन होइ।
बूडा बंस बड़ाइता यों जिनी बूड़े कोइ।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि यदि चंदन के वृक्ष के पास नीम का वृक्ष हो तो वह भी कुछ सुवास ले लेता है – चंदन का कुछ प्रभाव पा लेता है. लेकिन बांस अपनी लम्बाई – बडेपन – बड़प्पन के कारण डूब जाता है. इस तरह तो किसी को भी नहीं डूबना चाहिए. संगति का अच्छा प्रभाव ग्रहण करना चाहिए – अपने गर्व में ही न रहना चाहिए.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 91.

क्काज्ल केरी कोठारी, मसि के कर्म कपाट।
पांहनि बोई पृथमीं, पंडित पाड़ी बात।।

अर्थ – यह संसार काजल की कोठरी है, इसके कर्म रूपी कपाट कालिमा के ही बने हुए हैं. पंडितों ने पृथ्वी पर पत्थर की मूर्तियां स्थापित करके मार्ग का निर्माण किया है.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 92.

मूरख संग न कीजिए, लोहा जल न तिराई।
कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई।।

अर्थ – मूर्ख का साथ मत करो. मूर्ख लोहे के सामान है जो जल में तैर नहीं पाता डूब जाता है. संगति का प्रभाव इतना पड़ता है कि आकाश से एक बूंद केले के पत्ते पर गिरकर कपूर, सीप के अंदर गिरकर मोती और सांप के मुख में पड़कर विष बन जाती है.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 93

ऊंचे कुल क्या जनमिया जे करनी ऊंच न होय।
सुबरन कलस सूरा भरा साधु निनदै सोय।।

अर्थ – यदि कार्य उच्च कोटि के नहीं है तो उच्च कुल में जन्म लेने से क्या लाभ? सोने का कलश यदि सुरा से भरा है तो साधु उसकी निंदा ही करेगा.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 94.

कबीर संगति साध की, कड़े न निर्फल होई।
चन्दन होसी बावना, नीब न कहसी कोई।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि साधु की संगति कभी निष्फल नहीं होती. चंदन का वृक्ष यदि छोटा (वामन बौनी) भी होगा तो भी उसे कोई नीम का वृक्ष नहीं कहेगा. वह सुवासित ही रहेगा और अपने परिवेश को सुगंध ही देगा. अपने आसपास को खुशबू से ही भरेगा

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 95.

जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह।
ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु।।

अर्थ – जो जानबूझ कर सत्य का साथ छोड़ देते हैं झूठ से प्रेम करते हैं हे भगवान ऐसे लोगों की संगति हमें स्वप्न में भी न देना.

दोहा Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे –96.

पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया लिख लिख भया जू ईंट।
कहे कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट।।

अर्थ – ज्ञान से तड़ा प्रेम है – बहुत ज्ञान हासिल करके यदि मनुष्य पत्थर सा कठोर हो जाए, ईट जैसा निर्जीव हो जाए – तो क्या पाया? यदि ज्ञान मनुष्य को रुखा और कठोर बनाता है तो ऐसे ज्ञान का कोई लाभ नहीं. जिस मानव मन को प्रेम ने नहीं छुआ, वह प्रेम के अभाव में जड़ हो रहेगा. प्रेम की एक बूंद – एक छीटा भर जड़ता को मिटा कर मनुष्य को सजीव बना देता है.

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 97.

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ – सच्चा साधु सब प्रकार के भेदभाव से ऊपर उठ जाता है. उससे यह न पूछो कि वह किस जाति का है साधु कितना ज्ञानी है यह जानना महत्वपूर्ण है. साधु की जाती म्यान के समान है और उसका ज्ञान तलवार की धार के समान है. तलवार की धार ही उसका मूल्य है – उसकी म्यान तलवार के मूल्य को नहीं बढाती।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 98.

साधु भूखा भाव का धन का भूखा नाहीं।
धन का भूखा जो फिरै सो तो साधु नाहीं।।

अर्थ – साधु का मन भाव को जानता है, भाव का भूखा होता है, वह धन का लोभी नहीं होता जो धन का लोभी है वह तो साधु नहीं हो सकता!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 99.

पढ़े गुनै सीखै सुनै मीटी न संसै सूल।
कहै कबीर कासों कहूं ये ही दुःख का मूल।।

अर्थ – बहुत सी पुस्तकों को पढ़ा गुना सुना सीखा पर फिर भी मन में गिड़ा संशय का काँटा ना निकला कबीर कहते हैं कि किसी समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है ऐसे पठन मनन से क्या लाभ जो मन का संशय न मिटा सके?

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 100.

प्रेम न बाडी उपजे प्रेम न हाट बिकाई।
राजा परजा जेहि रूचे सीस देहि ले जाई।।

अर्थ – प्रेम खेत में नहीं उपजता प्रेम बाजार में नहीं बिकता चाहे कोई राजा हो या साधारण प्रजा – यदि प्यार पाना चाहते हैं तो वह आत्म बलिदान से ही मिलेगा. त्याग और बलिदान के बिना प्रेम को नहीं पाया जा सकता, प्रेम गहन – सघन भावना है – खरीदी बेची जाने वाली वस्तु नहीं!

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे – 101.

कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जानई सो काफिर बेपीर।।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि सच्चा पीर – संत वही है जो दूसरे की पीड़ा को जानता है जो दूसरे के दुख को नहीं जानते वे बेदर्द है – निष्ठुर हैं और काफ़िर है.

हम इस पोस्ट की माद्यम से कबीरदास के द्वारा रचित हुवा १०१+ सर्वश्रेष्ट “कबीर के दोहे” को हिंदी में उनके अर्थ के सात विवरण करने की प्रयास किये हे। सात में कबीरदास के जीवन की संक्षिप्त परिचय बी दिया हे। हमारी ये प्रयत्न से आप खुश हे तो ज़रूर कमेंट करिये और इस पोस्ट को अपने दोस्तों के सात शेयर करिये।

दन्यवाद

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